Friday, 19 June 2015

Essence : Veda



वेद-विभाग और वेद के विषय
वेद के चार विभाग हैं --जिन्हें ऋग्वेद , यजुर्वेद , सामवेद और अथर्ववेद के नाम से जाना जाता है ।
इस विभाजन का आधार है --उन में वर्णित विषय ।
ऋग्वेद में विज्ञान का वर्णन है । ऋग्वेद विज्ञान कांड है ।
यजुर्वेद में क्रिया और गति का वर्णन है । यजुर्वेद कर्म कांड है । सामवेद में उपासना का वर्णन है। सामवेद उपासना कांड है । अथर्ववेद में ज्ञान का वर्णन है । अथर्ववेद ज्ञान कांड है ।
ऋग्वेद का विभाग मंडलों में किया गया है । मंडल का अनुवाकों में और अनुवाक का सूक्तों में विभाग किया गया है । ऋग्वेद में दस मंडल हैं । ऋग्वेद के प्रथम मंडल में २४ अनुवाकों के १९१ सूक्तों में १९७६ मंत्र हैं ।
द्वितीय मंडल में ४ अनुवाकों के ४३ सूक्तों में ४२९ मंत्र हैं ।
तृतीय मंडल में ५ अनुवाकों के ६२ सूक्तों में ६१७ मंत्र हैं ।
चतुर्थ मंडल में ५ अनुवाकों के ५८ सूक्तों में ५८९ मंत्र हैं ।
पंचम मंडल में ६ अनुवाकों के ८७ सूक्तों में ७२७ मंत्र हैं ।
षष्ठ मंडल में ६ अनुवाकों के ७५ सूक्तों में ७६५ मंत्र हैं ।
सप्तम मंडल में ६ अनुवाकों के १०४ सूक्तों में ८४१ मंत्र हैं ।
अष्टम मंडल में १० अनुवाकों के १०३ सूक्तों में १७२६ मंत्र हैं । नवम मंडल में ७ अनुवाकों के ११४ सूक्तों में १०९७ मंत्र हैं ।दसम मंडल में १२ अनुवाकों के १९१ सूक्तों में १७५४ मंत्र हैं । इस प्रकार ऋग्वेद में कुल मिला कर ---
दस मंडलों में ८५ अनुवाकों के १०२८ सूक्तों में १०५८९ मंत्र हैं ।
यजुर्वेद का विभाग अध्यायों में किया गया है । यजुर्वेद में कुल ४० अध्याय हैं । यजुर्वेद के ४० अध्यायों में कुल १९७५ मंत्र हैं ।
सामवेद का विभाग आर्चिकों में और आर्चिक का विभाग अध्यायों में किया गया है ।।सामवेद में कुल ३ आर्चिक हैं ---(१)छंद आर्चिक जिसे पूर्वार्चिक भी कहते हैं , (२)महानाम्न्यार्चिक और (३) उत्तरार्चिक ।
छंद आर्चिक या पूर्वार्चिक को अध्यायों में और अध्याय को दशतियों में विभाजन किया गया है ।महानाम्न्यार्चिक के और उपविभाग नहीं हैं ।उत्तरार्चिक को अध्यायों में और अध्याय को सूक्तों में विभाजन किया गया है ।
पूर्वार्चिक के ६ अध्यायों को ६४ दशतियों में बांटा गया है ।पूर्वार्चिक में कुल ६४० मंत्र हैं ।
महानाम्न्यार्चिक में १० मंत्र हैं ।
उत्तरार्चिक में कुल २२ अध्याय हैं ।इन २२ अध्यायों में कुल ४०२ सूक्त हैं , जिनमें १२२५ मंत्र हैं ।
सामवेद में कुल १८७५ मंत्र हैं ।
अथर्ववेद का विभाग कांडों और सूक्तों में किया गया है ।
अथर्ववेद में २० कांड है ।
इन कांडों का विभाजन सूक्तों में किया गया है ।
अथर्ववेद के ७३१ सूक्तों में ५९७७ मंत्र हैं ।
वेद के विषय
वेद में लौकिक और पारलौकिक सभी विषयों का उपदेश दिया गया है । मनुष्य धर्मं ,अर्थ और काम की सिद्धि प्राप्त कर सके , इसलिए ईश्वर ने उसे लौकिक विषयों का उपदेश दिया है । धर्मं , अर्थ और काम की सिद्धि के पश्चात् मानव मुक्ति की और भी बढ़ सके , मुक्ति प्राप्त कर सके इस उद्देश्य से पारलौकिक , आध्यात्मिक ज्ञान का उपदेश दिया है ।
लौकिक विषयों के उपदेश से कई लाभ है । लौकिक विषयों के उपदेश से ही तो मनुष्य को इस जीवन में सुख पूर्वक रहने का ज्ञान प्राप्त हो सकता है । बिना इस संसार के बारे में जाने - बूझे कोई व्यक्ति कैसे सुखी रह सकता है ? जैसे , किसी को स्वास्थ्य के नियमों का ज्ञान नहीं होगा तो वह बीमार रहेगा और दुःख पाएगा । जिसे लेन -देन का ज्ञान नहीं होगा उसका धन कोई ठग ले जाएगा । जिसे धन कमाने नहीं आएगा उसेभूखे मरना पड़ेगा , आदि - आदि । इन सभी के बारे में वेद उपदेश है ।
वेद में , मनुष्य की शरीर रचना , आरोग्य विज्ञान , चिकित्सा विज्ञान , प्राणि शास्त्र , वनस्पति विज्ञान , रसायन विज्ञान , भौतिक विज्ञान , गणित आदि विज्ञान की जितनी भी शाखा -उपशाखाएँ आज के वैज्ञानिक जानते हैं वे सभी तो है ही इनके अतिरिक्त ऐसे विज्ञान भी हैं जिनका पता आज के वैज्ञानिकों को नहीं है ।शिल्प कला , शिक्षण कला , संगीत कला , आदि सभी कलाओं का उपदेश भी वेद में पाया जाता है । नक्षत्र विद्या , कृषि विद्या , वाणिज्य विद्या आदि का वर्णन भी वेद में पाया जाता है । वेद सभी विद्याओं के ग्रन्थ हैं ।
वेद में जादू - टोने , झाड़ -फूंक , इन्द्रजाल आदि विद्याओं का वर्णन नहीं है । वेद में केवल सत्य विद्याओं का ही उपदेश है । वेद में मिथ्या विद्याओं का उपदेश नहीं है । मिथ्या विद्या उसे कहते हैं ---जो मानव को मिथ्या ज्ञान कराएँ अर्थात झूठा ज्ञान दें । जो चीज हो ही नहीं उसे होने का आभास करा दे । वास्तविक को अवास्तविक और अवास्तविक को वास्तविक होने का विश्वास दिला दे । जैसे --इंद्रजाल के द्वारा जो चीज न हो उसे प्रत्यक्षदिखा देते हैं । जैसे --किसी को बातों ही बातों में मोह लेना और उसका धन छल कपट से ले लेना । ये मिथ्या विद्याएँ कहलाएंगी ।
वेद में इतिहास नहीं है । वेद में इतिहास होने का प्रश्न ही उपस्थित नहीं होता है । जब ईश्वर ने मनुष्य को बनाया उसी समय वेद का उपदेश भी दिया । अतः उस समय इतिहास की कोई बात हो ही नहीं सकती थी । इसीलिए वेद में इतिहास नहीं है ।
वेद में किस्से कहानियां भी नहीं हैं । वेद में विशुद्ध ज्ञान के विषय ही है ।
पारलौकिक विद्या का अर्थ होता है -- वह विद्या जिसमें इस मानव जीवन के पहले या इसके बाद की स्थिति -परिस्थितियों का वर्णन हो । या यों कहें कि जन्म से पहले और मृत्यु के बाद की स्थिति के विषय । वेद में पारलौकिक विद्या के बारे में अनेक बातें बतलाईं गईं हैं । पाप -पुण्य , मृत्यु के पश्चात् कर्म फल के भोग के बारे में , पुनर्जन्म , मोक्ष आदि के बारे में वेद में उपदेश है ।
अध्यात्म विद्या -
जो विद्या आत्मा के बारे में बतलाती है उसे अध्यात्म विद्या कहते हैं । अध्यात्म विद्या में आत्मा परमात्मा सम्बन्धी ज्ञान का उपदेश होता है । वेद में अध्यात्म विद्या का पूरी तरह प्रतिपादन किया गया है । आत्मा जन्म धारण क्यों करता है ? वह विभिन्न योनियों में क्यों जाता है ? कैसे जाता है ? आत्मा की उन्नति कैसे होती है ? वह मुक्ति कैसे प्राप्त करता है ? मुक्ति की अवस्था में आत्मा की स्थिति कैसी होती है ? आत्मा का स्वरुप कैसा है ? उसके गुण , कर्म और स्वभाव कैसे है ? परमात्मा का स्वरुप कैसा है ? परमात्मा सृष्टि रचना क्यों करता है ? परमात्मा के स्वरुप के ज्ञान से ही मुक्ति प्राप्त हो सकती है ; अन्य कोई उपाय नहीं है , आदि बातों का वेद में उपदेश किया गया है ।
आत्मा की उन्नति के लिए वेद में कई उपाय बतलाए गए हैं ।
आत्मा की उन्नति के लिए सरल हृदय से ईश्वर की स्तुति , प्रार्थना और उपासना करनी चाहिए ऐसा वेद में बतलाया गया है ।
मनुष्य धर्मं का पालन करे , धर्मं का पालन करते हुए धन कमाए , धर्म पूर्वक कमाए हुए धन से अपने जीवन की आवश्यकताओं की पूर्ति करे , अपना मानव जीवन सफल बना सके , और इनके आधार पर ही मुक्ति पथ का पथिक बनकर मुक्ति की प्राप्ति कर सके , इसके लिए आवश्यक सभी ज्ञान -विज्ञान , विद्याओं आदि का पूरा -पूरा वर्णन वेद में किया गया है ।
वैदिक ज्ञान पूर्णतः तर्क संगत है । वेद में किसी विषय का तर्क संगत ज्ञान ही दिया गया है । जो तर्क के विरुद्ध हैं , ज्ञान -विज्ञान के विरुद्ध हैं , बुद्धि के विपरीत हैं , प्रकृति के नियमों के विपरीत हैं , ऐसी बातें , ऐसा वर्णन , ऐसा उपदेश वेद में नहीं है

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