Thursday, 18 June 2015

Essence : SUPREME


अनेजदेकं मनसो जवीयो नैनद् देवा आप्नुवन् पूर्वमर्षत्।
तद् धावतोऽन्यानत्येति तिष्ठत् तस्मिन्नपो मातरिष्वा दधाति।।- यजुर्वेद ४॰.४।।
शब्दार्थ - वह (एकम्) एक है, (एन्-एजत्) निर्गत-कूटस्थ है, (मनसः जवीयः) मन से अधिक वेगवान् है; मन की वहाँ पहुंच नहीं है। (न) न (देवाः) इन्द्रियदेव ही (एनत्) इसको (आप्नुवत्) पाते हैं। (तत् पूर्वम् अर्षत् तिष्ठत्) वह पूर्व-गामी, कूटस्थ (धावतः अन्यान्) अन्य दौड़ते हुओं को (अति एति) लांघ रहा है। (तस्मिन्) उसी में (मातरिश्वा) आत्मा, अन्तरिक्ष (अपः) कर्मों-कर्मफलों, लोकों को (दधाति) धारण करता है।
Self is one and itself only. It is more powerful than mind,intellect & senses . It is a winner always in a race with all. By its power only all revolves.

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