Monday, 8 December 2014

Our-true-Self-is-ever-present-illuminating






हमारा वास्तविक स्वरूप का किसी काल में नाश नही होता है। यह तो प्रकृति --शरीर , मन ,बुद्धि ,अहंकार  में  ही परिवर्तन  होता है। यह  अनुभव भी है --हमारा शुद्ध स्वरूप ज्यों का त्यों  ही रहता है जाग्रत ,स्वप्न ,सुषुप्ति में परन्तु प्रकृति में निरन्तर ही परिवर्तन होता रहता है।  शरीर ,बुद्धि आदि सबका  विकास होता है फिर छय होता है। अपने शुद्ध स्वरूप मैं रहना ही जीवन है और प्रकृति में अहं -मम  भाव रखकर बरतना ही मृत्यु है।

श्रुति --स मृत्युम् मृत्युम् आप्नोति ।
             इह एव नानेव  पश्यति   । ।

जो यहाँ नानात्व देखता और बरतता है वो मृत्यु से मृत्यु को प्राप्त होता है।

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